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Anatomy physiology

REPRODUCTIVE & GENETIC DISORDER

REPRODUCTIVE & GENETIC DISORDER

**REPRODUCTIVE & GENETIC DISORDERS**
**प्रजनन संस्था की बीमारियाँ**
गर्भाशय या यूटस (uterus) पिंक (pink यानी हल्की गुलाबी) रंग का है। इसका वजन 57 ग्राम है। इसकी शेप (shape) यानी आकार पीच (peach) नामक फल की तरह की है। इसके दो छिद्र ऊपर है जिस से हर मास एक ओवम (ovum) आता है – गर्भ धारण होने के लिये।
यूटस के दोनों तरफ एक-एक ओवरी (ovary यानी डिंब ग्रंथी) है, जिस में हर मास एक ओवम पक कर निकलता है और इन फलोपियन ट्यूब्स (fallopian tubes) द्वारा वह ओवम यूटस में जाता है। हर ओवरी में 2 या ढाई लाख ओवम होते है। लड़की जब जन्म लेती है तो दोनों ओवरीज में चार पांच लाख ओवम रहते है, जो दोबारा बनते नही है। औरत अपने जीवन काल में पांच सौ से ज्यादा ओवम (अण्डे) इस्तेमाल (use) नही करती। उसकी दोनों ओवरीज में बहुत से अण्डे मैच्च्योर (mature) होते रहते है। फिर जिस ओवरी से पहले मैच्च्योर अण्डा फूटा वा निकला, तो बाकी के सब अण्डे उसी समय दब जायेंगे। क्योंकि जभी अण्डा फूटता है मैच्च्योर होकर बाहर निकलता है, उसी समय उस से एक केमिकल निकलेगा जो बाकी के सब अण्डो वा ओवमज को – जो पक रहे होते है – दबा देगा। ये दोनों कार्य (अण्डों का या ओवम का फोलिकल या सैक (sac) से मैच्च्योर होना या पक कर सैक (sac) से बाहर निकलना) ऐन्टीरियर पिट्यूटरी (anterior pituitary) से जो दो हॉर्मोन FSH & LH निकलते है, उनसे होता है।
मासिक: गांव की लड़कियों को मासिक कुछ देर से शुरू होता है क्योंकि वे शहरी लड़कियों की तुलना में शाम और रात में कमती रोशनी में रहती है। पहले जब दीपक ही जलते थे तो मासिक और भी देर से शुरू होती थी। बाद में बिजली के हल्के बल्बों वा कमती लाइट – जो आम पीली-सी होती है – उसके प्रभाव से मासिक ग्यारह (11) साल से ऊपर शुरू होता है, मगर शहरों में जहां ज्यादा लाइट या रोशनी है – जैसे ट्यूब लाईट की रोशनी में – लड़कियों को नौ साल ही में मासिक शुरू होने की संभावना रहती है।
मासिक धर्म का सम्बन्ध चांद से है। इसे 28 दिन में आना चाहिये तो ठीक है। अगर लेट (late) है तो 30 दिन में आना चाहिये। 28 दिन के चक्र के हिसाब से पहले 14 दिन एस्ट्रोजन काम करते है, जो कि सेकेन्ड्री सेक्स ऑर्गनज (secondary sex organs) को उकसाते है या बनाते है या ध्यान रखते है। और 14 वे दिन उनके कार्य बंद हो जायेगे, फिर 15 वे दिन से प्रोजेस्टोजेन (progesterone) काम शुरू कर देते है, जो कि यूट्स की ऐन्डोमीट्रियम (Endometrium यानि अंदरी परत) को 27 दिन तक (14 + 13) दिन बनाते रहते है। फिर 28 वे दिन प्रोजेस्टोजेन (progesterone) काम नही करते और मासिक धर्म आ जाते है।
जिस दिन मासिक धर्म आये उस दिन से चार दिन ही मासिक आना चाहिये और यह चार दिन में संभोग नही करना चाहिये। फिर छः दिन सेफ (safe) समय है, यानि इस दौरान संभोग करने तो बच्चा नही होगा। उसके बाद आठ दिन के अंदर किसी भी दिन अण्डा कौन्सिव हो सकता है, फिर दस दिन सेफ (safe) हो सकते है। वैसे अगर मासिक धर्म 28 दिन का हो तब ही ये सब हिसाब लागू होंगे। पर हमें रिस्क नही लेना चाहिये क्योंकि चिन्ता इत्यादि के कारण मासिक चक्र आगे पीछे हो जाते है, सो अगर बच्चा नही चाहिये तो कन्डोम (condom) लगाना उत्तम है।
ध्यान देनेवाली बात यह है कि प्रोजेस्टेरॉन का कार्य सिर्फ पिछले चौदह दिन का है, जबकि एस्ट्रोजन के कार्य के दिन ज्यादा-कम होते रहते है। इसे निम्न उदाहरण से समझ सकते है। समझो मासिक धर्म 28 दिन के जगह 35 दिन में आता है तो पहले चार दिन ब्लीडिंग के, फिर तेरह दिन सेफ (safe) होंगे – जो कि 28 दिन वाले चक्र में सिर्फ छः दिन थे – फिर आठ दिन गर्भ धारण की शंका, फिर दस दिन सेफ।
पर हमें किसी प्रकार का भी रिस्क नही लेना चाहिये, और अगर बच्चा नही चाहिये तो पुरुष को कोन्डोम (condom) लगाना ही उत्तम मार्ग है। कुछ लोग अपने औरतों को ‘कॉपर-T या डायाफ्राम’ वगैरह लगवा देते है, जबकि इनसे से औरत को बहुत नुकसान होता है। सब से अच्छा है कि पुरुष अपना ही ऑपरेशन कराये। एक तो वह दस मिनट का ऑपरेशन है, दूसरा इस में संभोग करने में कोई फर्क नही पड़ता – न उस के ईरैक्शन (erection) में या दूसरा कोई फर्क आता है। अगर फर्क होता है तो यह कि उसमे स्पर्म नही होते, बाकी सब फ्लूइड्स ठीक रहती है। दूसरा पुरुष के स्पर्म उस के शरीर के सब हड्डी, मसल्स जें बनने के बाद बनते है, और स्पर्म ही में उसकी शक्ति है, और अगर वह 74 दिन इसे इस्तेमाल यानि use नही करे, तो शरीर उस स्पर्म को सोख लेगा और जब मनुष्य इनका इस्तेमाल ही नही की, तो मेरे विचार से वह संभोग किया करने के बाद भी एक तरह का शक्ति-हीन नही है, क्योंकि उसकी शक्ति शरीर के अंदर ही है, और उसकी शक्ति कम नही होगी। और शक्ति कम न होने के कारण संभोग के बावजूद उसकी आयु लम्बी होगी, और वह बीमारियों से मुक्त होगा – अगर उस के खाने पीने का ढंग, चिन्ता न करना, रोज व्यायाम करना वा उत्तम वायु में रहना इत्यादि ठीक होगा तो।
मासिक धर्म के दौरान औरत पुरुष से अलग रहनी चाहिये और पुरुष को उसे छेड़ना ही नही चाहिये क्योंकि मासिक धर्म बिगड़ जायेगा। और अगर पुरुष ने उस दौरान उसे संभोग कर लिया तो उसे चमड़ी।
या स्किन प्रॉब्लम आ जायेगी और औरत को कमजोरी अधिक या थकावट अधिक हो जायेगी और उसे भी शारीरिक नुकसान होगा। पचास साल पहले के जमाने में तो औरतों को मासिक में अलग कमरे में रखा जाता था और वह स्नान भी चार दिन नहीं करती थी। दर असल मासिक धर्म में स्नान नहीं करना चाहिये क्योंकि ब्लीडिंग रुक जाती है जो ठीक नहीं है। स्पोज (sponge) ही करना चाहिये। अगर औरत गर्म पानी से नहाती है और उसे ब्लीडिंग ज्यादा आती हो तो ब्लीडिंग बढ़ जायेगी और अगर ठंडे पानी से नहाती है तो शरीर में ददों के साथ-साथ ब्लीडिंग रुक जायेगी। इसी प्रकार ज्यादा गर्म या ठंडा पीने से नुकसान होगा, तो मासिक धर्म में ज्यादा गर्म या फ्रिज का पानी या ठंडे पेय नहीं चाहिये। मासिक धर्म में तो नदी में या बाहर कतई नहीं नहाना चाहिये – औरत को बहुत ही नुकसान होता है।
ऐसा है कि औरत की आम शरीर की टैम्परेचर (temperature) 98.6 °F या 98.4 °F है, पर सोई अवस्था में यह कम से कम 97.4 °F होनी चाहिये तो ही उसका अण्डा कौनसीव (conceive) होगा, नहीं तो नहीं होगा। मासिक धर्म के दौरान 97 °F या उससे कम होता है, फिर चार दिन के बाद 97.4 °F होना चाहिये, फिर वह बढ़ना चाहिये। अगर इस से कम होगा मसलन 96.5 °F इत्यादि तो अण्डा कौनसीव नहीं होगा। जिस दिन अण्डा सैक (sac) यानि थैली से निकलता है उस दिन औरत की शरीर की सारा दिन का टैम्परेचर 99 या अधिक होगी एवं होनी चाहिये। शरीर में गर्मी बढ़ने के अलावा, उस दिन उसके चेहरे का रंग रोजमर्रा से ज्यादा लाल या ग्रेसफुल (graceful) और सेक्सी (sexy) होगा, और उस दिन उसके विचार भी सेक्स (sex) के प्रति अधिक होंगे। और उस दिन सोई अवस्था में उसकी टैम्परेचर 28 दिन के चक्र के अन्य दिनों से कुछ तो अधिक होगा। और अगर पुरुष ने उस दिन उससे सम्भोग किया हो तो उसे गर्भ होने की सम्भावना अधिक है – अगर औरत का बॉडी टैम्परेचर उस दिन सोई अवस्था में 97.4 से अधिक होगा तो – और दूसरा औरत के वजाईना में अल्कालीन की मात्रा अधिक होनी चाहिये मतलब एसिड की मात्रा कम होनी चाहिये। तीसरा, पुरुष के स्पर्म फलोपियन ट्यूब या ओवरी के द्वार पर कम से कम तीन हजार से अधिक स्पर्म चाहिये तो गर्भ अवश्य धारण हो जायेगा।
सम्भोग पूरा होने के बाद बीस मिनट तक स्पर्म वजाईना में रहते है। औरत की वजाईना में फ्ल्यूड वा पुरुष के सीमन (semen) की फ्ल्यूड (seminal fluid) दोनों अल्कालीन होती है, जब कि स्पर्म घोर एसिड में रहते है और जिस के कारण वे सुस्त होते है। और औरत के वजाईना में जो फ्ल्यूड है वह अल्कालीन हो तो बीस मिनट बाद वह स्पर्म होशियार हो जाता है और यूट्रस के सर्विक्स द्वारा ऊपर चढ़ना शुरू कर देता है और ओवरी के द्वार पर चालीस मिनट में पहुंच जाता है। और अगर वजाईना में एसिड की मात्रा ज्यादा हो तो स्पर्म वहीं सुस्त रह जाता है और ऊपर सर्विक्स में न चढ़ता हुआ मर जाता है। अण्डा निकलने से पहले फलोपियन ट्यूब या ओवरी के द्वार पर कम से कम तीन हजार स्पर्म अवश्य चाहिये, नहीं तो वे अण्डे की बाहरी परत को भेद नहीं सकते। अण्डे के मुख पर एक प्रकार की एसिड रहती है जो अण्डे की परत को गला सकती है या गल सकती है और उस को समाप्त करने के लिये कम से कम तीन हजार स्पर्म चाहिये तब जा कर एक स्पर्म अन्दर जायेगा। जैसे ही एक स्पर्म अन्दर जायेगा, तुरंत उसी क्षण अण्डे के बाहर की जिल्द या टिश्यू या म्यूकस एक दम सख्त हो जायेगा ताकि दूसरा स्पर्म अन्दर न जा सके। स्पर्म के अन्दर जाते ही स्पर्म की पूंछ कट जाती है फिर उसका शरीर या हैड और ओवम या अण्डे का न्यूक्लियस दोनों को इकट्ठे होने मे या मिक्स होने मे या दोनों का एक बनने मे दो या ढाई दिन लगते है, फिर एक का दो होने मे एक या डेढ़ दिन लगता है। फिर यह जल्दी जल्दी स्पिलट (split) यानि एक का दो होने मे जल्दी जल्दी करते है। जैसे ही अण्डे में बीस तक सैल्लज बनते है तो यूट्रस के अंदर जो 80% ट्रोफोब्लास्ट रहते है, वे धीमे धीमे घुस जाते है और वे बच्चे को जीन्ज के मुताबिक बना देते है। LMNT कहती है कि ट्रोफोब्लास्ट जीन्ज (genes) की भाषा को जानते है।
स्पर्म जब ओवम में जाता है तो अपने साथ एक लाख जीन्ज (genes), एक लाख प्रोटीनज (proteins) और 23 क्रोमोसोम (chromosomes) ले कर जाता है, एवं ओवम में भी एक लाख जीन्ज, एक लाख प्रोटीनज और तेवीस क्रोमोसोम होते है। मनुष्य अपने सारे जीवनकाल में छः से आठ हजार प्रोटीनज ही इस्तेमाल करता है या use करता है। हर दो तीन साल में एक जीन्ज कम हो जाते है। ऐसा बहुत ही कम अवसर होगे जब कि दोनों स्त्री या पुरुष के एक तरह के जीन्ज कम हुए हो। एक बार चूहों पर एक प्रयोग किया गया कि पुरुष चूहे के स्पर्म से आन्तड़ियो के जीन्ज निकालने के बाद उसे स्त्री चूहे के गर्भ के अन्दर छोड़ा गया। उन्होंने सोचा कि इसके बच्चे के आन्तड़ियाँ नहीं होगी क्योंकि उन्होंने उसके जीन्ज को निकाल दिया था। मगर जब चूहे बच्चे पैदा हुए तो उन बच्चों की आन्तड़ियाँ थी, कारण उन्होंने पुरुष के जीन्ज निकाले थे, पर स्त्री के अण्डे के कारण उन बच्चों के आन्तड़ियाँ थी।
ध्यान रहे कि बीस परसेंट ट्रोफोब्लास्ट शरीर में अन्य जगह पर है। मेडिकल साइन्स को मालूम नही है कि इसका क्या कार्य है, पर LMNT कहती है कि जब ट्रोफोब्लास्ट जीन्ज की भाषा को जानता है और बच्चे को जीन्ज के मुताबिक ही बनाता है तो अगर आपको इस को उकसाने का आता हो तो जो कार्य शरीर मे अपूर्ण रह गया हो तो आप इन ट्रोफोब्लास्ट द्वारा उसे पूर्ण कर सकते है। मेरे पास दो लड़कियाँ आई।
जिनको जन्म से ही यूट्रस या ओवरीज़ नहीं थी। दूसरे डॉक्टर का कहना था कि यह जेनेटिक डिफेक्ट (genetic defect) है जो ठीक नहीं हो सकता। मैंने सोचा कि क्या ऐसा नहीं हो सकता कि जिन जीन्स ने यूट्रस या ओवरीज़ बनानी थी उनके आर्टरीज में कोई ब्लड क्लॉट (blood clot) होने से उनकी ग्रोथ रुक गयी या उनका बनना नहीं हो सका? तो इसी सोच से मैंने heparin फार्मूला देकर तथा ट्रोफोब्लास्ट को उकसाकर वह सब ठीक किया तो उसके (uterus & ovaries) बनने लग गए। और उनकी सोनोग्राफी (sonography) की जिसमें यूट्रस भी और ओवरीज़ भी आ गई।
यूट्रस में घुसने के बाद एंडोमेट्रीयम (endometrium) ओवम का इंतज़ार करती है, और प्रोजेस्टेरोन नामक हार्मोन उस ओवम के लिये एंडोमेट्रीयम और मुलायम और नरम बनाती रहती है। अगर ओवम कौनसीव हुआ है तो ठीक है, अगर ओवम कौनसीव हुआ नहीं है तो एंडोमेट्रीयम गलना शुरू कर देती है, और मैन्स आ जाते है। एंडोमेट्रीयम की मोटाई 6 mm तक होती है जो मैन्स के पहले के दिन तक रहती है और मैन्स में वह घटकर 1 mm तक रह जाती है। अंडा या ओवम जब सैक (sac) से बाहर निकलता है तो सीलिया (cilia) द्वारा फलोपियन ट्यूब में यूट्रस की तरफ धकेला जाता है, फलोपियन ट्यूब्स में भी वेव्स (waves) या लहरें चलती रहती है, जिन के द्वारा अंडा या ओवम यूट्रस में आ जाता है। अगर कौनसीव हुआ ओवम आता है तो मैन्स आने बंद हो जाते है, और ओवरीज़ के हार्मोन्स उस ओवम का ध्यान रखते है।
कुछ औरतों में कमजोरी या अन्य कारणों से मैन्स के दौरान एंडोमेट्रीयम कहीं पूरी भी निकल जाती है, इसी लिये मैन्स में ल्यूकोसाईटस /WBC’s) निकलते है ताकि जहां से एंडोमेट्रीयम सम्पूर्ण निकल गई है वहाँ पर की नंगे होने के कारण कोई इन्फेक्शन न हो जाये इस समय में। मतलब मैन्स में सफ़ेद पानी निकलना स्वाभाविक है, खराब नहीं। मगर मैन्स के आगे पीछे सफ़ेद पानी नहीं निकलना चाहिये अगर ज्यादा निकले तो उसे ल्यूकोरिया (leucorrhea) की बीमारी कहते है। इसका ज्यादातर कारण पुरुष की स्त्री के निप्पल (nipples) को छेड़ना है। उनको बार बार छेड़ने से ही ल्यूकोरिया की बीमारी आ जाती है। सो स्त्री को इस बात का ध्यान रखना चाहिये। ज्यादा सफ़ेद पानी जाने से या निकलने से आंखो के नीचे कालापन आ जाता है, या मुख पर की आभा कम हो जाती है या ग्रेस (grace) निकल जाती है, क्योंकि यह सफ़ेद पानी बहुत कीमती प्रोटीन है जिसे बनाने में काफी शक्ति निकल जाती है। अगर ये ज्यादा मात्रा में निकल जाय तो कालापन आ जाता है, और कमजोरी भी महसूस होगी।
ओवम के अन्दर जो सैल्स रहते है उन्हें खाने के लिये यह ट्रोफोब्लास्ट एंडोमेट्रीयम के परत को ही खिलाते है। फिर ट्रोफोब्लास्टस उस ओवम के लिये जगह खोजते हुए उस यूट्रस के अन्दर उस अंडे को घुसा देते है। जहां से वह अंडा अन्दर एंडोमेट्रीयम में जाता है एक झिल्ली या ढकना की परत-सी आ जाती है। यूट्रस के अन्दर खाली इतनी सी जगह होती है कि एक टी स्पून (tea spoon) जितना पानी आ सकता है। (यह उस के अन्दर कितनी जगह है यह दर्शाता है या बताता है)
फिर अंडा या ओवम उस एंडोमेट्रीयम के अन्दर पलना शुरू हो जाता है और उसकी जड़ें बन जाती है और रक्त भी बनना शुरू हो जाता है। ध्यान रहे कि बच्चा अपने ही खून से बड़ा होता है व पलता है। बहुत रिस्क है कि बच्चा अपने ही खून से बड़ा होता है व पलता है और दोनों के बीच में एक पतली सी टिशू (tissue) की दीवार होती है जो दोनों के रक्त को आपस में मिक्स (mix) नहीं होने देती। हां, बच्चे के शरीर के waste products यानि फालतू चीजें और कार्बनडाई ऑक्साईड इत्यादि उस झिल्ली द्वारा माँ के खून में चले जाते है और माँ के रक्त से ऑक्सीजन बच्चे को चला जाता है, साथ में दूसरे इलेक्ट्रोलाईट्स भी जो जो चाहिये वे भी उसी झिल्ली द्वारा बच्चे के रक्त के अन्दर मिल जाते है।
बच्चा जिस फ्लूइड में रहता है, हर तीन घन्टे में बदल जाते है वह हर बार-पन्द्रह घन्टे, में सोडियम, पोटैशियम इत्यादि इलेक्ट्रोलाईट्स भी बदल जाते है। बच्चा जिस थैली में बड़ा हो रहा होता है उसे प्लेसेंटा (placenta) कहते है, जो बच्चे का बहुत ध्यान रखता है। प्लेसेंटा बच्चे के लिये प्रोजेस्टेरोन, एस्ट्रोजेन एवं HCG नामक हार्मोन बनाता है, एवं अगर लड़का हो तो उसके HCG हार्मोन मात्रा में बनाता है। और माँ से जितने जीन्स में कोड होते है (gene code) जाने देता है जो बच्चे के थायमस टेस्टोस्टेरोन भी बनाता है। और वे मेमोरी सैल्स में चले जाते है। यही थायमस ग्लैंड बच्चे की इम्यूनिटी बनाता है। और बच्चे के लिम्फेटिक सिस्टम (सफेद रक्त सैल्स) को तैयार करता है। इसके ये मेमोरी सैल्स में पूर्वजों के सब कोड जो जो बीमारियों के इलाज के उनके अन्दर थे – वे भर दिये जाते है और उस बच्चे में उन उन बीमारियों से लड़ने की क्षमता उस बच्चे में भर दी गई होती है, और वह किसी भी बीमारी से लड़ने की क्षमता रखता है। यही कारण है NT किसी भी दवाई या इंजेक्शन (पोलियो इत्यादि) के विरुद्ध है, क्योंकि जब पहले ही हमारे अन्दर सब कुछ मौजूद है तो फिर पोलियो इत्यादि का इंजेक्शन क्यों कर लगाना? पोलियो का इंजेक्शन बने पैंसठ साल हुए – इस के बाद ही अधिक बीमारी आई है, इस से पहले इतनी बीमारी नहीं थी !!
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*OVUM**
ओवम (अंडा) मानव शरीर की अन्य सेल्स (कोशिकाओं) से कई गुना बड़ा होता है। वह गोलाकार होता है। इसका diameter (व्यास) करीब 110 – 160 µ होता है, जिसमें एक मुख्य भाग ‘जोना पेलुसिडा’ (zona pellucida) का होता है, जो 10 – 20 µ इतना मोटा होता है। ओवा (Ova) multiply नहीं होते, यानी उनकी संख्या बढ़ती नहीं है, पर स्पर्म multiply होते हैं। (एक हो तो ‘ovum’ कहते हैं, अनेक हों तो ‘ova’ कहते हैं)।
ओवरीज़ (ovaries) के बाहर fingers-type बाल होते हैं जिन्हें सीलिया (cilia) कहते हैं, जो अंडे को fallopian tube में ढकेलते रहते हैं। अंडा fallopian tube में 24 hours तक ज़िंदा रह सकता है और इसी दौरान स्पर्म को इससे संपर्क करना चाहिए, नहीं तो fertilization यानी निषेचन नहीं होगा। जब अंडा fallopian tube में आ जाता है, तो वहां पर minimum 3000 sperms होने ही चाहिए, क्योंकि उनके साथ जो केमिकल आएगा, उससे अंडे की ऊपर की झिल्ली गलेगी। 3000 से कम स्पर्म होने से केमिकल कम होगा, झिल्ली नहीं गलेगी और स्पर्म अंदर नहीं जा सकता। Ovum की झिल्ली गलकर जब एक स्पर्म अंदर जाएगा, तो उसकी झिल्ली सख्त हो जाएगी ताकि दूसरा स्पर्म न जा सके।
अंडे और स्पर्म दोनों के क्रोमोसोम्स (chromosomes) सेंटर यानी बीच में आ जाते हैं। उनकी मेम्ब्रेन एक हो जाती है ताकि क्रोमोसोम्स मिक्स हो जाएं – ये दोनों मिक्स होकर एक सेल बन जाते हैं, जिसे ज़ाइगोट (zygote) कहते हैं और बच्चे की उत्पत्ति शुरू हो जाती है। अंडा और स्पर्म से बना हुआ यह सेल शरीर के सब सेल्स से बड़ा सेल होता है। इसमें सेल से दोगुना ज़्यादा cytoplasm और nucleus होता है। पहले इन को एक सेल बनने में 4 दिन लगते हैं, फिर 2 cells बनने में 30 hrs, फिर 2 के 4 बनने में 10 घंटे लगते हैं – मगर अंडे का size same ही रहता है। यह सीलिया की लहरों द्वारा uterus में जाता है। इसमें 20 से 32 तक blastomeres होते हैं। अंदर की झिल्ली नई बनती है, अंडे की पहली झिल्ली खत्म हो जाती है। फिर यह अंडा endometrium में uterus के पीछे भाग में attach हो जाता है यानी जुड़ जाता है। यह एक खास जगह ही क्यों चुनता है मालूम नहीं – वहां जड़ें जमाना शुरू कर देता है। 10 दिन में यह जड़ें जमा लेता है। फिर झिल्ली ही प्लेसेंटा (placenta) बन जाती है। फिर रक्त की नलिकाओं द्वारा उसे nutrients यानी पोषण तत्व मिलते रहते हैं।
प्लेसेंटा सब काम करता है – बच्चे को ऑक्सीजन की सप्लाई देना, बच्चे के शरीर के waste products यानी फालतू चीजों को मां के लंग्स, लिवर और किडनी द्वारा निकालना आदि। प्लेसेंटा ग्लाइकोजेन आदि स्टोर करता है। हार्मोन्स बनने शुरू हो जाते हैं जो uterus को ज़्यादा बढ़ने नहीं देते, ब्रेस्ट बढ़ने लग जाती है, मां के toxin को बच्चे के अंदर जाने से रोकता है – मां का और बच्चे का खून अलग-अलग होता है।
स्पर्म की लंबाई 55 से 65 µ होती है। Head 5 µ होता है, मोटाई 2 µ होती है। स्पर्म्स fallopian tube में जाते हैं, फिर भी fallopian tube में कुछ हज़ार ही पहुंच पाते हैं।
**Capacitation :-** यह 1950 में मालूम पड़ा है कि स्पर्म को पहले कुछ देर तक औरत के वजाईना के अंदर ही समय काटना चाहिए। उस समय में वजाईना के अंदर स्पर्म के नोक के ऊपर एक रासायनिक प्रक्रिया होती है। उसके बाद ही उसमें अंडे को फर्टिलाइज़ करने की क्षमता प्राप्त होती है। उस जगह पर जो स्पर्म पर प्रक्रिया होती है उसे capacitation (कपैसिटेशन) कहते हैं।
मनुष्यों में इस प्रक्रिया के लिए सात घंटे लगते हैं। स्पर्म की नोक या tip को एक्रोसोम (acrosome) कहते हैं, जिसमें Hyaluronidase Acid नामक एन्ज़ाइम होता है, जो ovum की झिल्ली को गलता है और स्पर्म अंदर जाता है। झिल्ली को ही Zona Pellucida कहते हैं।
अंडे को fallopian tube से uterus में जाने में 3-4 दिन लगते हैं। अगर खाने वाले अंडे में heart की जगह के सेल्स देखा जाए तो उनके अंदर उन्हें फड़-फड़ करते पाएंगे एक ही tune से – यही heart की धड़कन है।
पिट्यूटरी ग्लैंड (Pituitary gland) अगर गोनाडोट्रोपिक हार्मोन (gonadotropic hormone) नहीं बनाए, तो ओवरीज़ काम नहीं करेंगी, जैसे कि बचपन में पाया जाता है।

### **शिशु का शारीरिक विकास**
गर्भ में शिशु का विकास इस प्रकार होता है:
| आयु | विकास की स्थिति |
|—|—|
| **4-5 सप्ताह** | बच्चे का साइज़ एक मटर के दाने जितना होता है। |
| **6 सप्ताह** | बच्चे के सिस्टम शुरू हो जाते हैं, हार्ट भी काम करना शुरू कर देता है, छोटे-छोटे लिम्बज (limbs buds) पहले हाथ, फिर पांव। |
| **7 सप्ताह** | कुछ मनुष्य की तरह दिखने लगेगा, नाक की जगह उभार सी आएगी, जौ या जबड़ा बनेगा, आंखों की जगह बनेगी। |
| **8 सप्ताह** | लिम्बज यानी हाथ, पैर, आंखें, कान, मुंह, नाक, पुरुष या स्त्री स्पष्ट दिखना, हार्ट, लंग्स, किडनी, लिवर, डाइजेस्टिव ट्रैक, ब्रेन का थोड़ा बनना। |
| **9 सप्ताह** | लंबाई 3.5 सेंटीमीटर, वजन 1 ग्राम, हाथों व पांव का दिखना, पैंक्रियाज का काम करना शुरू करना, उसके साथ ही सब ट्रोफोब्लास्ट्स का काम समाप्त होना, और उन सब ट्रोफोब्लास्ट्स का समाप्त होना या मरना, बच्चे के सब ग्रंथियों का बन जाना, आगे केवल बढ़ने का काम रहना। |
| **11 सप्ताह** | लंबाई 6.5 सेंटीमीटर, आंखों के पर्दों का मिलना छोटे महीने तक, अब यूट्रस बढ़ना शुरू कर देगा, बच्चे के सेक्स के प्रति मालूम होना। |
| **14 सप्ताह** | लंबाई 13.0 सेंटीमीटर, खून का बनना चौथे महीने से ही शुरू हो जाता है। |
* शिशु की लंबाई और वजन के बारे में अतिरिक्त जानकारी: सातवें महीने से वजन बढ़ने लगता है। पूरे टर्म (complete term weight) तक वजन 3 से 4 किलो और लंबाई 50 सेंटीमीटर (20 इंच) तक हो जाती है।
### **जन्म से पूर्व महत्वपूर्ण शारीरिक तंत्र (Bypass System)**
जन्म से पहले बच्चे के फेफड़े (lungs) काम नहीं करते हैं और उन्हें केवल 10% रक्त मिलता है। उस समय ऑक्सीजन प्लेसेंटा से प्राप्त होती है जो लिवर जैसा भी काम करता है। जन्म से पहले तीन नलिकाएं होती हैं जो बच्चे के हृदय, लिवर और फेफड़ों को बायपास करती हैं। जब जन्म के 48 घंटों के अंदर ये तीन अंग काम करना शुरू कर देते हैं, तब ये तीनों बायपास नलिकाएं अपने आप बंद हो जाती हैं:
1. **Foramen Ovale:** यह भ्रूण (fetus) के हृदय के दोनों एट्रिया (atria) के बीच की ओपनिंग है।
2. **Ductus Arteriosus:** यह मुख्य पल्मोनरी आर्टरी (the main pulmonary artery) और एओर्टा (aorta) के बीच रक्त प्रवाह का मार्ग (channel of communication) है।
3. **Ductus Venosus:** यह अम्बिलिकल वेन (umbilical vein) की पिछली शाखा है जो लिवर को बायपास करके इन्फीरियर वेना कावा में रक्त लेकर जाती है। जन्म के एक से तीन घंटों के बाद डक्टस वीनोसस की दीवारें मसल जोर से संकुचित हो जाती हैं और यह रास्ता सदा के लिए बंद हो जाता है।
### **अन्य महत्वपूर्ण तथ्य**
* **X-Ray की सावधानी:** भ्रूण के लिए X-Ray हानिकारक होता है। उनकी किरणों के रेडिएशन गर्भ के सेल्स को नष्ट कर सकते हैं और क्रोमोसोम के स्ट्रक्चर (बनावट) को बदल सकते हैं, जिससे असामान्य विकास (abnormal development) होने का खतरा बढ़ जाता है।
* **मुट्ठी और ब्रेन का संबंध:** यदि अंगूठा बंद मुट्ठी में हो, तो माना जाता है कि मस्तिष्क ठीक से काम नहीं कर रहा है। भ्रूण की मुट्ठी में अंगूठा अंदर और चारों उंगलियां उसके ऊपर होती हैं, इसे मंद बुद्धि की एक पहचान माना गया है।
* **रक्त संचार और शरीर:** माँ के पेट में बच्चे का रक्त प्रवाह अलग होता है। ऑक्सीजन युक्त रक्त पहले सिर के भाग में जाता है, फिर नीचे के भाग में।
* **कपाल (Skull):** बच्चे का सिर धड़ से बड़ा होता है। स्कल की हड्डियां कई टुकड़ों से जुड़ी होती हैं ताकि जन्म के समय स्कल दबकर टूट न जाए। मस्तिष्क (Brain) का विकास सबसे पहले होता है।
* **सुरक्षा:** तीसरे महीने तक प्लेसेंटा के दोनों झिल्लियां ‘कोरियन’ (Chorion) और ‘एमनियन’ (Amnion) जुड़ जाते हैं। गर्भ का शिशु ‘एमनियोटिक फ्लूइड’ (amniotic fluid) में सुरक्षित तैरता रहता है। बच्चा इसी फ्लूइड में पेशाब भी करता है।

को थोड़ा पीता भी रहता है। तीसरे महीने में प्लेसेंटा गर्भ से छह गुना बड़ा हो जाता है, लेकिन बाद में वह हर दिन श्रिंक (सिकुड़ता) होता रहता है और जनम के समय तक घटकर गर्भ का 1/5 वां भाग वजन तक ही रह जाता है।
अगर बच्चे का वजन एट बर्थ 2.5 kg से कम है तो नौ महीने के बाद जनम होने पर भी उसे प्रीमेच्योर बच्चा ही कहा जाएगा।
प्रीमेच्योर बच्चे के लंग्स डेवलप्ड नहीं होते, इसीलिए उन्हें इनक्यूबेटर में रखा जाता है। लेकिन ऑक्सीजन की मात्रा सही होनी चाहिए। कम नहीं होना चाहिए और ज़रा-सी लापरवाही से अगर ऑक्सीजन की मात्रा ज्यादा हो तो वे बच्चे अंधे हो जाएंगे – इसे रेट्रोलेंटल फाइब्रोप्लेसिया (Retrolental Fibroplasia) कहते हैं।
गर्भ के दौरान प्लेसेंटा भी हार्मोन्स बनाता है – मां के हृदय की गति एवं उससे रक्त का निकास दोनों ही बढ़ जाते हैं। किडनीज़ भी अपना उत्पादन बढ़ाते हैं – मदर का मेटाबॉलिज्म बदल जाता है – उसकी पाचन क्रिया स्लो हो जाती है पर न्यूट्रिएंट्स का अवशोषण और पूर्ण रूप से और अच्छी तरह से होते हैं।
बच्चा सक (suck) करना यानी चूसना तथा स्वैलो (swallow) करना यानी निगलना – ये दोनों कार्य भी कभी-कभी करता रहता है – चाहे वह लिमिटेड है इस अवस्था में, पर वह करता है। सोई अवस्था में वह सोता है – जागती अवस्था में वह कभी-कभी आंखें खोलता है या घुमाता है। जागती अवस्था में इसे ज्यादा आवाज भी सुनाई देती है। ज्यादा लाइट या मां ने अचानक पोजीशन चेंज की यानी अपनी स्थिति बदली तो उसे उसे मालूम पड़ता है। हर 3 घंटों के बाद एमनियोटिक फ्लुइड चेंज हो जाता है – हर 12 to 15 hours में इलेक्ट्रोलाइट्स भी चेंज हो जाते हैं। सोडियम और पोटैशियम भी बदले जाते हैं।
प्रेगनेंसी के बाद अगर (6) Rt. Ov for Progesterone – दिया जाय तो प्रेगनेंसी मार्क्स यानी गर्भ के दौरान जो पेट की त्वचा खींच जाने के निशान हैं वे भी निकल जाते हैं।
Progesterone के निम्न कार्य हैं –
* सभी टिशूज तथा मांस-पेशियों को नरम करना, खास कर यूट्रस तथा उसके सर्विक्स (cervix) यानी द्वार के मसल्स को, जिससे गर्भ को यूट्रस के अंदर सही जगह पर आसानी से बिठाने में मदद हो।
* यूट्रस की इरिटेबिलिटी यानी चिड़चिड़ापन को कम करता है, जिससे गर्भ पात के आसार कम हो जाते हैं।
* सर्विक्स को तैयार करता है कि बच्चे के जनम के समय उस पर जो स्ट्रेचिंग यानी खिंचाव आयेगा उसे वह सह सके।
प्लेसेंटा के कुछ कार्य –
* प्लेसेंटा के हार्मोन्स ही मां के ब्रेस्ट्स यानी थन को तैयार करते हैं कि उसमें दूध ठीक से और पर्याप्त मात्रा में बने और निकले।
* लेकिन मां के हार्मोन्स आसानी से प्लेसेंटा से गर्भ के अंदर नहीं जा सकते। अगर कोई गलती से पहुँच गये तो प्लेसेंटा से कुछ खास एन्जाइम्स निकलते हैं जो उन्हें खत्म कर देते हैं।
* पर प्रेगनेंसी के अंतिम काल में प्लेसेंटा के अनुमति से कई ऐन्टीबॉडीज़ मां से बच्चे के अंदर जा पाते हैं जिससे कि बच्चे को उन सभी रोगों के विरुद्ध रोग प्रतिकार शक्ति मिले जिन रोगों से मां के शरीर ने सफलता पूर्वक सामना किया है।
हर बच्चे को जनम से ही उन सभी रोगों के प्रति इम्युनिटी (immunity) होती है जिनसे पिछले सभी पीढ़ियों के वंशजों ने सामना किया हो। यही कारण है कि गुरुजी बार-बार कहते हैं कि पोलियो तथा अन्य टीका इत्यादि लगाने की कोई जरूरत नहीं है।
Diary 23rd Jan ’90: अगर किसी बच्चे के दोनों पैर बाहर की ओर फैलते रहे तो समझ ले कि वह नॉर्मल डिलीवरी से नहीं, बल्कि सिजेरियन ऑपरेशन द्वारा पैदा हुआ है।
……………

**BIRTH**
एड्रीनल ग्लैंड्स दोनों किडनीज के ऊपर स्थित हैं, मगर पेट के अंदर उन पर कुछ extra muscles होते हैं और उनका वजन जन्म के समय के एक मास बाद से double यानि दुगुना होता है। ये बच्चे के लिये जन्म से पहले इसे बाहर आने के लिये तैयार करते हैं। ये जन्म के बाद कुछ ज्यादा hormones बनाते हैं। ये extra glycogen बच्चे के शरीर में जमा कर देते हैं खास कर liver and heart में ताकि Oxygen की देरी से, (मतलब जन्म के बाद बच्चे ने तुरन्त नहीं रोया तो) कोई heart को नुकसान न हो और वह beat करना बंद न कर दे। ये दिल को बहुत मजबूत बना देते हैं ताकि किसी कारण वश तकलीफ न हो – बच्चे को माँ के पेट में placenta ही से oxygen मिलती है।
ये lungs को जन्म के पिछले दो महीनों में बहुत ही मजबूत कर देते हैं ताकि श्वास लेने में कोई तकलीफ न हो। यही कारण है कि premature बच्चे अपने आप श्वास नहीं ले सकते – तकलीफ होती है – क्योंकि नौवें महीने में ही lungs बनते हैं।
पिछले 1½ महीना बच्चा बहुत घूमता है बाहर आने की तैयारी के लिये – कभी सिर ऊपर कभी नीचे – पीछे सिर नीचे रहता है – बल्कि पिछले दिनों womb यानि गर्भाशय के साथ नीचे उतर जाता है ताकि माँ को श्वास लेने में तकलीफ न हो – क्योंकि bladder पर बच्चे का वजन आ जाता है। फिर माँ को बार बार पेशाब आता है, क्योंकि bladder ज्यादा नहीं फूल सकता वजन के कारण।
Implantation – यानि यूट्रस में अंडा अपनी सही जगह पहुँचने के बाद – प्रोजेस्टेरॉन हॉर्मोन एंडोमेट्रियम के cells को बहुत मजबूत बना देता है। एवं वह उसे भरपूर nutrients यानि पोषण देता है ताकि conceptus यानि कौन सी क्रिया हुआ गर्भ के बच्चे को लाभ हो। Implantation के बाद, trophoblast cells इन एंडोमेट्रियम के cells पर हमला कर इन्हें खाते हैं और इनके nutrients से ही conceptus को शुरू में खुराक मिलता है। Conceptus के खून वगैरह बनने के बाद – करीब आठ सप्ताह के बाद – यह काम बंद हो जाता है और बच्चे की growth शुरू हो जाती है। Implantation के 16-वें दिन की supply शुरू हो जाती है। Fetus का खून दो umbilical arteries से जाना शुरू कर देता है एवं एक umbilical vein से pure खून आना शुरू हो जाता है। दोनों का खून – माँ एवं बच्चे का – अलग अलग होता है, तथा दोनों खून की दूरी 3.4 इंच है।
**प्लासेन्टा का फंक्शन -**
गर्भ का रक्त जो प्लेसेन्टा में आता है, उसमें ज्यादा मात्रा में कार्बन डाय ऑक्साइड होता है, पर इसका अधिकांश भाग गर्भ के रक्त से माँ के रक्त अंदर diffusion द्वारा घुस जाता है। Loss of carbon dioxide makes the fetal blood more alkaline, whereas increased carbon dioxide in the maternal blood makes it more acidic.
यानि कार्बन डाय ऑक्साइड निकल जाने से गर्भ का रक्त ज्यादा ऐल्कलली युक्त होता है, जब कि कार्बन डाय ऑक्साइड ज्यादा बढ़ने से माँ का रक्त ज्यादा एसिडिक हो जाता है। इन कारणों से गर्भ के रक्त में ऑक्सीजन के साथ जुड़ने की क्षमता बढ़ जाती है, जब कि माँ में वह क्षमता कम हो जाती है।
इसका मतलब है प्राणायाम से pH of blood ठीक हो सकता है। शरीर में oxygen की मात्रा बढ़ाने से acidity i.e. carbon dioxide कम होगी या alkalinity बढ़ जायेगी।
माँ के पेट से बाहर निकलने के लिये Mature foetus काफी तैयारियाँ करती है जो उन हॉर्मोन्स से होती है जो उसके Adrenal glands बनाते हैं – ताकि बाहर की दुनिया में उसे कोई तकलीफ न हो। बच्चे का सिर नीचे स्थिर हो जाने को प्लासेन्टल(?) कहते हैं – cephalic presentation, अगर सिर ऊपर हो तो एड्रीनल(?) कहते हैं breech presentation.
Labor यानि प्रसूति के पहले दर्दों के आने के दो तीन सप्ताह पहले बच्चा एवं पैर नीचे उतर जाते है, जिसे lightening कहते है, – ताकि माँ आराम से श्वास ले सके। यह अमूमन white women यानि विदेश के गोरे औरतों ही में होता है। जन्म से तकरीबन एक महीना पहले बच्चा दानी के मुँह में स्थिर हो जाता है, जिसे engagement of the head कहते है। यह पहले बच्चे में जरा ध्यान देना पड़ता है – दूसरे एवं आगे बच्चों के लिये यह ऐसा बताता है कि माँ का pelvis का size and shape ठीक है।
**Onset of labour :-** सारी pregnancy में uterus रोज सिकुड़ता रहता है जो उसका अभ्यास है। यह माँ को मालूम नहीं पड़ता, कभी कभी ही मालूम पड़ता है। ऐसा लगता है कि यह तब होता है जब प्रोजेस्टेरॉन की मात्रा कम हो जाती है। अब ऐसा समझा जा रहा है कि शायद यह अवस्था foetus यानि गर्भ का बच्चा ही लाता है hormonal reaction से। बच्चे के brain में पहले hypothalamus से ही लिंक होता है – अगर यह theory ठीक है तो शायद ACTH hormone छोड़ता है ताकि ADR corticosteroids बच्चे का एड्रीनल ग्लैंड

ज्यादा मात्रा में बना सके जो बच्चे के लिये बहुत जरूरी है। ये स्टेरॉइड्स मां के शरीर के अंदर हार्मोन्स के बैलेंस में बदलाव लाते है और उसके टिश्यूज को प्रोस्टाग्लैन्डिनस हार्मोन्स बनाने के लिये उकसाते है। प्रोस्टाग्लैन्डिनस – इनमे हार्मोन्स, विटामिनस एन्जाइम्स और कंटेलिस्टस इन सभी के कुछ-कुछ गुण शामिल है। PgX नामक एक प्रोस्टाग्लैन्डिन है। शायद शरीर के सभी टिश्यूज के अंदर प्रोस्टाग्लैन्डिनस कुछ मात्रा में है। यह थम्बस बनने नही देता और आटरीज़ के स्मूथ मसल्स को रिलैक्स जो आटरीज़ के दीवार मे बनते है। यह थम्बस बनने नही देता और आटरीज़ के स्मूथ मसल्स को रिलैक्स जो आटरीज़ के दीवार मे बनते है। यह थम्बस बनने नही देता और आटरीज़ के स्मूथ मसल्स को रिलैक्स जो आटरीज़ के दीवार मे बनते है। यह थम्बस बनने नही देता और आटरीज़ के स्मूथ मसल्स को रिलैक्स जो आटरीज़ के दीवार मे बनते है। यह थम्बस बनने नही देता और आटरीज़ के स्मूथ मसल्स को रिलैक्स जो आटरीज़ के दीवार मे बनते है। यह थम्बस बनने नही देता और आटरीज़ के स्मूथ मसल्स को रिलैक्स जो आटरीज़ के दीवार मे बनते है। यह थम्बस बनने नही देता और आटरीज़ के स्मूथ मसल्स को रिलैक्स जो आटरीज़ के दीवार मे बनते है। यह थम्बस बनने नही देता और आटरीज़ के स्मूथ मसल्स को रिलैक्स जो आटरीज़ के दीवार मे बनते है। यह थम्बस बनने नही देता और आटरीज़ के स्मूथ मसल्स को रिलैक्स जो आटरीज़ के दीवार मे बनते है। यह थम्बस बनने नही देता और आटरीज़ के स्मूथ मसल्स को रिलैक्स जो आटरीज़ के दीवार मे बनते है। यह थम्बस बनने नही देता और आटरीज़ के स्मूथ मसल्स को रिलैक्स जो आटरीज़ के दीवार मे बनते है। यह थम्बस बनने नही देता और आटरीज़ के स्मूथ मसल्स को रिलैक्स जो आटरीज़ के दीवार मे बनते है। यह थम्बस बनने नही देता और आटरीज़ के स्मूथ मसल्स को रिलैक्स जो आटरीज़ के दीवार मे बनते है। यह थम्बस बनने नही देता और आटरीज़ के स्मूथ मसल्स को रिलैक्स जो आटरीज़ के दीवार मे बनते है। यह थम्बस बनने नही देता और आटरीज़ के स्मूथ मसल्स को रिलैक्स जो आटरीज़ के दीवार मे बनते है। यह थम्बस बनने नही देता और आटरीज़ के स्मूथ मसल्स को रिलैक्स जो आटरीज़ के दीवार मे बनते है। यह थम्बस बनने नही देता और आटरीज़ के स्मूथ मसल्स को रिलैक्स जो आटरीज़ के दीवार मे बनते है।
बच्चे के जन्म के process को labour कहते है, क्योंकि इस समय माँ को extraordinary यानि असामान्य मेहनत करनी पडती है। जन्म के समय बच्चे के सिर का भाग निकलना शुरू हो जायेगा – जैसे जैसे cervix फैलेगा की ठोंडी छाती के साथ लग जाती है और वह बाहर निकलना शुरू हो जायेगा। जब सरविक्स पूरा फैल जाता है तब यूट्स, शुरू हो जायेगा, वैसे वैसे बच्चा बाहर निकलना शुरू कर देगा। सरविक्स और वजाइना एक continuous curved passage बन जाते है जिसे birth canal कहते है ताकि सरविक्स और वजाइना एक continuous curved passage बन जाते है ताकि बच्चा की डिलीवरी इस दुनिया में आसानी से हो सके। सब से पहले labour की first stage होने पर बच्चा की डिलीवरी इस दुनिया में आसानी से हो सके। सब से पहले labour की first stage होने पर बच्चा की डिलीवरी इस दुनिया में आसानी से हो सके। सब से पहले labour की first stage होने पर बच्चा की डिलीवरी इस दुनिया में आसानी से हो सके। सब से पहले labour की first stage होने पर बच्चा की डिलीवरी इस दुनिया में आसानी से हो सके। सब से पहले labour की first stage होने पर बच्चा की डिलीवरी इस दुनिया में आसानी से हो सके।
Birth and after birth :- जब cervix बिल्कुल खुल जाता है तो अपने आप उसी समय माँ के pituitary gland से एक हार्मोन Oxytocin निकलेगा जो बच्चे दानी के ऊपर के भाग को shrink होने के लिये मजबूर करेगा एवं यूट्स shrink होना शुरू हो जायेगा और बच्चा बाहर निकल आयेगा।
जन्म के बाद बच्चा सफेद एवं उसके नीचे ग्रे रंग का होता है क्योंकि उसका blood circulation यानि रक्त संचार अभी तक शुरू नही हुआ होता। चन्द श्वास लेने के बाद उसकी body का रंग पिंक हो जाता है – थप्पड़ मारकर रुलाया जाता है – नारू का धकधक करना बन्द होने के बाद ही उसे काट कर जाता है – बाधना चाहिये – एक सिरा बच्चे के पेट से एक इंच तक की दूरी तक काटा जाता है फिर बांधा जाता है। दूसरा सिरा चन्द दिनों बाद वह अपने आप सूख कर निकल जाता है पर इसका ध्यान रखना जरूरी है। दूसरा सिरा चन्द दिनों बाद वह अपने आप सूख कर निकल जाता है पर इसका ध्यान रखना जरूरी है। दूसरा सिरा चन्द दिनों बाद वह अपने आप सूख कर निकल जाता है पर इसका ध्यान रखना जरूरी है।
बच्चे के शरीर के ऊपर के amniotic fluid को पूरी साफ नही करनी चाहिये जन्म से आठ दिन तक – यह बच्चे को किसी भी प्रकार के infection से बचायेगा। चूंकि बच्चा गीली amniotic fluid में रहता है, उस के सारे शरीर पर झुर्रिये होती है, इसीलिए उसे गरम पानी से हल्का नहलाना चाहिये और नरम कम्बल में लपेटकर आराम दिलाना चाहिये और माँ को अवश्य देना चाहिये ताकि उसके शरीर की गरमी उसको सारी उमर याद रहे और यही उसके शरीर का राजा रहे। बच्चे का वजन 3 से 4 किलो होता है। इस समय बच्चे को सूजन रहती है – यह शकल 40 दिन तक बदलती रहती है।
नाडू काटने के 20 मिनट के बाद placenta यूट्स से बाहर आ जायेगा – Placenta बाहर निकलते ही uterus से एक हार्मोन निकलेगा जो pituitary gland को prolactin hormone छोड़ने के लिये उकसायेगा और माँ की breasts में दूध उतर आयेगा। लेकिन दूध थन से बाहर निकालने का काम oxytocin homone करेगा। यह हार्मोन माँ के pituitary gland से तब निकलेगा जैसे ही बच्चा माँ के थन को मुँह लगायेगा – यह दूध बच्चे को जरूर पिलाना चाहिये जब तक पीये। यह दूध पिलाने से सारा शरीर माँ का अच्छा रहता, ओज आती है। दूध पिलाने से breast में कोई नुकसान या ढीला पन नही आता – और बच्चे से मोह बढ़ता है। अक्सर देखा गया है जब तक बच्चा दूध पीयेगा दूसरे बच्चे की संभावना नही रहती, फिर भी रिस्क (risk) नही लेना चाहिये – कान्डोम इत्यादि से सुरक्षा करना चाहिये।
अगर लड़की पैदा हुई हो तो 40 दिन में और अगर लड़का हो तो 80 दिन में uterus अपनी same शकल (size) में आयेगा। यही कारण है कि चालीसवाँ दिन को function करते है।
बच्चे के पहले श्वास लेते ही heart में का hole एक flap से बन्द हो जाता है। कभी कभी किसी का hole बन्द नही होता तो बड़ा होने पर operations द्वारा बन्द किया जाता है – बाकी सब bypass 15 दिन के अन्दर बन्द हो जायेंगे – सोये सोये नीचे का भाग बच्चे का लाल और ऊपर का पीला पड़ जाता है जमीन की gravity के कारण – फिर खून का दौरा ठीक होने पर सब ठीक ठाक हो जायेगा।

पूज्य गुरुजी के श्रीमुख से कुछ अन्य महत्वपूर्ण बातें –
* अंधेरे कमरे में ही प्रसव होना चाहिये ताकि औरत के शरीर से बहुत पसीना निकले जिससे उसके शरीर के toxins निकल जायेगे जो माँ और बच्चे दोनों के लिये लाभदायक है। पहले जमाने में कमरे में एक अंगीठी रखा जाता था ताकि औरत को बहुत पसीना आये। आजकल AC room में delivery किया जाता है जो बच्चे और माँ दोनों के सेहत के लिये खराब है।
* प्रसव के दौरान, और बाद में भी, हर औरत के बदन से एक खास किस्म की बू निकलती है, जो कुदरत ने इसलिये बनाया है कि उसका पति उस smell यानि वास के कारण उससे दूर रहे और उसे न छेड़े। लेकिन उस औरत की माँ को उस smell का पता नहीं चलता।
* प्रसव के दर्द के समय शरीर से प्रोस्टाग्लैंडिन्स निकलते है जो यूट्रस को सिकुड़ने के लिये उकसाते है। लेकिन प्रसव का दर्द मानसिक कारणों से ज्यादा महसूस होता है। दर्द आने का मुख्य कारण यह है कि उस समय औरत अपने यूट्रस के मसल्स को बहुत tight यानि कड़क कर लेती है, क्योंकि उसके मां ने उसे बचपन से ही डराया हुआ होता है कि ” जरा बच्चा पैदा करके तो देखो तो दर्द क्या होता है पता चलेगा!”
* दूध पिलाते समय बच्चे के हाथ को खोल देना चाहिये ताकि वह माँ के थन के साथ खेले – ऐसे करने से Oxytocin ज्यादा बनेगा और दूध ज्यादा निकलेगा। ऐसी औरतों को एक ही समय में ज्यादा पानी पीने के बजाय दिन में अनेक बार कम मात्रा में पानी पीना चाहिये। कैल्शियम के लिये इन्हें दूध भी पीना चाहिये।
* बच्चे को हमेशा दोनों हाथों से उठाना चाहिये – एक हाथ से उठाने से अपचन या Loose motions हो सकते है।
* बच्चे के जब दाँत निकलते है तब फीवर या loose motions लूज़ मोशन यानि दस्त हो सकते है। उस समय उसे 50% दूध और 50% साबूदाना का पानी पिलाना चाहिये। इससे दस्त आना बन्द हो जायेगा लेकिन फीवर दो दिन तक रह सकता है – सो बुरी बात नहीं है – दस्त से शरीर को नुकसान पहुँचता है।

…………..

**Estrogen & Progesterone formula**
जैसे-जैसे LMNT में कामयाबी पाते गये, वैसे उनके पास तरह-तरह के प्रॉब्लम लेकर कई युवतियाँ एवं औरतें आने लगी। उनमें सबसे अधिक वे औरतें थी जिन्हें माहवारी ठीक समय पर नहीं आती थी। सभी का पेट एवं पाचन बिगड़ा हुआ ही रहता था। तो पेट ठीक करने के ट्रीटमेंट देकर तथा LiV⁰- Mu⁰ के दर्दों को ठीक करने के उपचार देने से ही कई औरतों के मासिक आ जाते थे। लेकिन सभी को ऐसा नहीं होता था। तो गुरुजी सोच में पड़े कि इसे ठीक कैसे करें?
फिजियोलॉजी से हमें मालूम है कि मैन्स याने मासिक का आना ओवरीज द्वारा एस्ट्रोजेन (estrogen) हॉर्मोन बनाने पर निर्भर है। एस्ट्रोजेन का काम स्तन, गर्भाशय इत्यादी की देखभाल करना है।
जिनका मासिक चक्र 28 दिन के हो उनमें मैन्स के बाद 13-14 दिन तक एस्ट्रोजेन बनते है। फिर बन्द होते है। मासिक आने के बाद 15वां दिन से 27वां दिन तक प्रोजेस्टेरॉन (progesterone) बनते है। यूटेरस की एण्डोमीट्रियम (endometrium) यानि अन्दर की परत या तह को बनाते है। अगर ओवम में वीर्य का स्पर्म (sperm) चला गया हो तो याने गर्भधारण हो गया हो तो वे इसे धारण कर कर प्रसूति तक गर्भ की देख भाल करते है। और अगर गर्भधारण नहीं हुआ हो तो 27वां दिन के बाद प्रोजेस्टेरॉन बन्द होता है, एस्ट्रोजेन बनते है और मासिक आ जाते है। अगर एस्ट्रोजेन ठीक समय पर न निकले तो माहवारी आयेगी नहीं। अब समझे कि एस्ट्रोजेन को उकसाने के लिये हमें किन चीजों पर ध्यान देना है –
* मनुष्य के जन्म से ही sexual functions यानि सैक्स-सम्बन्धी क्रियाओ को निर्णय करनेवाली सबसे मुख्य ग्रंथी है पीनियल ग्लैंड (pineal gland) यानि पीनियल ग्रंथी जो मेलाटोनिन (melatonin) हॉर्मोन द्वारा हाइपोथैलमस (hypothalamus) को आदेश देती है।
* उचित समय मे हाइपोथैलमस से FSH.RH नामक हॉर्मोन निकलेगा।
* FSH.RH द्वारा संदेश मिलने पर ऐंटीरियर पिट्यूटरी से FSH नामक हॉर्मोन निकलेगा।
* FSH के आदेश से ओवरीज एस्ट्रोजेन बनायेगे।
सो इन चारो को अगर क्रम से उकसाये तो एस्ट्रोजेन बनने लगेगा।
अब प्रश्न यह है कि ओवरीज तो दो है – तो क्या दोनों को ही उकसाना है? हम कैसे समझें कि किस को उकसाना है?
इस प्रश्न से NT को एक ऐसी खोज मिली है जिस पर विश्व में शायद किसी ने ध्यान नहीं दिया है।
यह खोज दुनिया में लाजवाब है और वह यह है कि दोनों ओवरीज एक-जैसा काम नहीं करतीं! और सबसे मजे की बात है कि इस तथ्य को साबित करने के लिये हमें किसी प्राणी या मनुष्य को चीर-फाड़ कर या किसी प्रकार का laboratory test करने की आवश्यकता नहीं है! विश्वास नहीं होता न?
यहाँ पर हम पाठक को फिर एक बार, न्यूरोथेरेपी के एक मूल तथ्य को याद कराना चाहते है जो अनुभव से प्राप्त है। शरीर में चाहे तकलीफ कोई भी क्यों न हो, वह चन्द ग्रंथियों (मुख्यतः एक या दो ग्रंथियो) के बिगड़ने से ही आयी है। और गुरुजी ने तजुर्बे से पाया है कि किसी भी अंदरी अंग की गड़बड़ी से आयी बीमारी मे नाभि के आसपास में किसी खास जगह पर दर्द होता ही है। अगर हम उस सम्बन्धित जगह की दर्द निकालने में सक्षम हो, तो वह अंग पुनः ठीक से काम करेगा और बीमारी ठीक होगी।
यही लौजिक (logic) यानि तर्क को इस प्रॉब्लम को हल करने में लाया गया। कई औरतों से पूछताछ और दर्दों की जाँच-पड़ताल के बाद यह देखा गया कि जिनको माहवारी देरी से आती थी उन्हें ‘Lt.OV’ में ही बहुत ज्यादा दर्द होती थी। जिसे ठीक करने के लिये हमें ‘Lt.OV’ को ही उकसाना है।
**Estrogen formula**
(½) Ku – 40 secs
(6) Medulla
(4) Thrd ‘P’
(6) Lt.Ov.
**(½) Ku – 40 secs**
पीनियल ग्लैंड को उकसाने के लिये
हाइपोथैलमस को उकसाने – FSH.RH के लिये
ऐंटीरियर पिट्यूटरी को उकसाने – FSH के लिये
लेफ्ट ओवरी को उकसाने – एस्ट्रोजेन बनाने के लिये
अधिकांश औरतों में इस उपचार देने के 12 घण्टे के अन्दर माहवारी आ जाती है। इसका मतलब माहवारी के देरी से आने से उसे ‘Lt.OV’ देकर ठीक कर सकते है।

किताबों में यह भी पाया गया कि एस्ट्रोजेन थाइमस को inhibit यानि रोकते हैं। इस अनुमान से डायाबीटीस या अन्य ऑटो इम्यून डिसॉर्डर में जब हम ‘Lt.Ov’ का उपचार देते है, तो पेशेंट को तुरन्त लाभ मिलता है।
इन सभी से गुरुजी इस निष्कर्ष पर आये कि ‘Lt.Ov’ यानि बायी ओवरी ज्यादा मात्रा में एस्ट्रोजेन बनाती है – जो ऊपर के तथ्यों के अनुसार सच साबित होता है। इसलिये इसे **Estrogen formula** कहा गया।
कभी कभी मासिक रुक जाते है – उस के लिये भी Estrogen formula बहुत उपयोगी है। ऐसे कई औरतों को लाभ प्राप्त हुआ। लेकिन एक बार एक औरत ऐसी आयी जिसे इस फौरमुला को दो-चार बार देने के बावजूद मासिक नहीं आये। तो दुबारा काफी सोच-विचार करने के बाद गुरुजी इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि हमने तो सही क्रम से उसका दिया है। लेकिन अगर किसी नलिका के अन्दर कोई क्लॉट (clot) होगा तो हमारा उपचार का संदेश उचित स्थान तक नहीं पहुँचेगा न? तो निश्चय किया कि क्लॉट खोलने के लिये P. Heparin देना चाहिये। और इसके कुछ ही घंटों के बाद माहवारी आ जाती है। जो गुरुजी के तथ्य को सच साबित करती है।
इतना ही नहीं। अगर किसी औरत के स्तन ठीक से नहीं बने तो यह उपचार देने से उनके स्तन बनी चाहिये – यह टैस्ट करना है।
अब ‘Lt.Ov’ से एस्ट्रोजेन बनता है – यह साबित होने के बाद यह अनुमान लगाना कठिन नहीं है कि ‘Rt. Ov.’ से प्रोजेस्टेरोन ज्यादा मात्रा में बनेगा जिसके लिये निम्न उपचार बनाया गया।
* * * * * * * * * * * * **Progesterone formula**
**I (6) Rt.Ov. II (½) Ku – 40 secs (6) Medulla (4) Thrd ‘P’ (6) Rt.Ov.**
* * * * **Prolapse treatment: यानि ‘P-point’**
दोनों जांघ के मसल (mid thigh) को बारी-बारी से 3 बार दबाने से और तुरंत (6) W.D. देने से उतरा हुआ गर्भाशय सेट हो जायेगा।
**Progesterone Formula के उपयोग**
1. Potassium बढाने के लिये
2. अगर accident के बाद पैरों में 24 घंटे swelling हो, उसे कम करने (Nageshji, Ashram 2008)
3. हाई बी.पी. के दौरान swelling हो तो कम करने
4. शरीर के किसी भी भाग में 24 घंटे swelling हो तो कम करने के लिये

Sanjay Yadav
Sanjay Yadav
Author
Mr. Sanjay Yadav is the Founder and Director of Ys Neurotherapy Health and Research Foundation and a qualified Neurotherapist from Mumbai, India, with extensive experience in the field...