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पाचन तंत्र या पाचन संस्था के मुख्य कार्य
हम जो कुछ भी खाएं, हमेशा पलाठी लगा कर ही खाना चाहिए ताकि रक्त का बहाव पेट की तरफ अधिक हो। यह इसलिए है कि कुदरत के नियम के मुताबिक खाने के बाद पेट और पाचन संस्था के अंगों में अधिक मात्रा में रक्त की जरूरत होती है। अगर भोजन के तुरंत बाद ही चलना या कोई अन्य भारी काम करना पड़े तो पाचन संस्था के अलावा हाथ-पैरों को भी ज्यादा रक्त की जरूरत होगी। जिसे पूरा करने के लिये हृदय को ज्यादा काम करना पड़ेगा। और इससे शरीर को तकलीफ होगी। यही कारण है कि हर व्यक्ति को (मुख्यतः हार्ट की बीमारी वाले रोगी को) खाना खाने के 20 मिनट बाद तक चलना-फिरना नहीं चाहिए – पर अगर वे वज्रासन में बैठें तो बहुत अच्छा है।
खाना खाने से पहले हाथ अच्छी तरह से साफ कर लेने के बाद खाना चाहिए। हमारे बूढ़े लोग आचमन करते हुये खाने की थाली के चारों तरफ पानी डालकर खाना शुरू करते थे – यह इसलिए है कि कोई कीटाणु या रेंगता हुआ कीड़ा या मकोड़ा न खाया जाये, क्योंकि अगर थाली के बाहर पानी पड़ा हो तो वह थाली में नहीं जा सकता।
खाने के बीच में या तुरंत बाद में पानी नहीं पीना। तो भी भोजन के समय पानी अवश्य पास में रखना चाहिए ताकि कभी निवाला अटकने पर या उसका लगने पर काम आये। भोजन करने के आधे घंटे बाद एक गिलास पानी पी सकते हैं और उसके बाद हर घंटे-डेढ़ घंटे बाद एक गिलास पानी पीना – ऐसे दिन में कम से कम दस-बारह गिलास पानी पीना चाहिए।
जबान – जबान के नीचे दोनों तरफ दांतों व गालों के बीच में कुछ लार निकलने के छिद्र हैं जहाँ से लार या लार निकलती रहती है जो लार ग्रंथियों तथा पैरोटिड ग्रंथी से आती है। यह लार स्टार्च यानि शुगर को पचाने की शुरुआत करता है।
जबान पर अलग-अलग जगह पर अलग-अलग स्वाद आने की जगह है। ये स्वाद की ग्रंथियां जबान के पिछले भाग में है। उनकी आयु दस दिन की होती है यानि इनके सेल्स हर दस दिन में बदल जाते हैं। अगर दवाई से या अन्य किसी कारण से ये सेल्स (cells) मर जाये और स्वाद न आ रहा हो तो वह स्वाद 10 दिन में नये सेल्स बनने के बाद आ जायेगा। अगर आपको जीना है लंबा – तो जबान का कहा कभी नहीं मानना!
जबान के पिछले भाग में पहले श्वास नलिका है एवं उसके पीछे ही खाने की नलिका है। जबान के पीछे के भाग में नासिकाओं के दो छिद्रों को बंद करने के लिये एक परदा-सा रहता है जो उन छिद्रों को उस समय बंद कर देता है जब हम निवाला अंदर गले में उतार रहे होते हैं, ताकि निवाले का माल श्वास नलिका में न जाये। यानि जब निवाला जबान के पिछले भाग से गुजर रहा होता है तो यह परदा श्वास नलिका पर आ जाता है जिस के ऊपर से निवाला गुजरता हुआ खाने की नली में चला जाता है। (इसे एपिग्लोटिस (epiglottis) कहते हैं) इसका काम यह देखना कि भोजन का कोई भी ठोस पदार्थ लंग्स के अंदर न जा पाये। अगर यह (epiglottis) ठीक से काम न करे तो उसका लगता है या कभी-कभी निवाले का थोड़ा भाग नाक के छिद्र द्वारा बाहर आ सकता है। निवाले को पेट में पहुँचने को 6 से 10 सैकण्ड लगते हैं। जैसे निवाला पेट में जाता है वैसे ही वहां का कार्डियक स्फीन्क्टर (cardiac sphincter) बंद हो जायेगा ताकि खाना वापस ऊपर न आ जाये।
खाना दांतों से खूब चबा कर खाना चाहिए। और हरि बुढ़ापे में दांत इसलिए तोड़ता है कि उस उम्र में मनुष्य को कम खाना चाहिए। चबाने इसलिए है के खाने के साथ-साथ ज्यादा से ज्यादा लाड़ भी पेट में जायेगा, और वहां 45 मिनट तक यह लार स्टार्च को कार्बोहाइड्रेट्स के बड़े-बड़े टुकड़ों में बदल देगा। लार को ठीक से कार्य करने के लिये pH 6.5 के आसपास होनी चाहिए। जब शुगर ऑक्सीजन के साथ मिलकर सेल्स के अंदर जायेगी तभी हमें एनर्जी मिलेगी जिससे हम भारी वजन उठाना इत्यादि कार्य कर सकते हैं। थूक बहुत ही कीमती है। सो उसे कभी waste नहीं करना चाहिए। तंबाकू या पान खाने के बाद जो बार-बार थूकते रहते हैं – उससे भी शरीर की एनर्जी घटती जायेगी – इसका ध्यान रहे।
खाना पेट में तहों में रहता है। जैसे समुद्र, खेत और रेगिस्तान में लहर चलते हैं वैसे हमारे सारे शरीर में लहरें चलती रहती है। पेशाब की थैली में भी लहर चलती है जिससे बूंद-बूंद करके पेशाब ब्लैडर यानि पेशाब की थैली में जाता रहता है। पेट में एक मिनट में तीन लहरें चलती है। पेट में कई चीज बनते हैं जिनमें मुख्य है – हाईड्रोकलोरिक एसिड नामक कैमीकल। यह एक काफी सख्त एसिड है जो तभी बनेगी [ ये तीनों चीज अलग-अलग जगह से निकलते है – एसिटाइल कोलाइन, हिस्टामाइन, एवं गैस्ट्रीन ।
(acetylcholine) – यह दसवें क्रैनियल नर्व यानि वेगस नर्व द्वारा ब्रेन से संदेश पाकर सारे पाचन तंत्र के सारे अंगों को उकसाता है – डिसेंडिंग कोलन को छोड़कर ।
हिस्टामाइन (histamine) – यह पेट में ही बनता रहता है।
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गैस्ट्रीन नामक हार्मोन – यह पाइलोरिक स्फीन्क्टर (pyloric sphincter) के बाहर से निकलकर रक्त में मिल जायेगा। यह तब बनेगा जब भोजन पेट के नीचे भाग (जिसे pyloric antrum कहते है) में पहुँचेगा। इसका कार्य है हाइड्रोक्लोरिक एसिड बनाने वाले सेल्स को संदेश पहुँचाना कि वे उचित मात्रा में एसिड बनाये।
ऐसिटाइल कोलाइन तथा हिस्टामाइन ठीक मात्रा में बने तथा सही समय में निकलने के लिये पैरा-सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम का ठीक से काम करना जरूरी है। अगर व्यक्ति बार-बार गुस्सा करता रहे या हर छोटी-मोटी चीज के लिये उत्तेजित होता रहे तो ये ठीक से नहीं निकलेंगे। इन तीनों में से किसी एक की भी कमी हो तो हाइड्रोक्लोरिक एसिड नहीं बनेगा।
पेट की एसिड इतनी सख्त होनी चाहिये कि पेट के स्राव का pH कम से कम 3 या उससे नीचे 1 तक जानी चाहिये। उस घोर एसिड में कोई बैक्टीरिया या वायरस जिन्दा नहीं रह सकता। एवं पेट का pH 3 से नीचे हो जाने पर वहां पर पेपसिन नाम का एन्जाइम (यानि कैमिकल) बनेगा जो खाने के दाल इत्यादि प्रोटीन को पचाना शुरू करेगा यानि उन्हें बड़े-बड़े टुकड़ों के झुंडों में बना देगा। इसलिये खाना खाते समय पानी नहीं पीना चाहिये ताकि यह एसिड 3 से नीचे जाये जिससे पेपसिन ठीक से कार्य कर सके।
पेट के अन्दरी परत को इस सख्त हाइड्रोक्लोरिक एसिड से बचाने के लिये म्यूकस (mucus) नामक एक क्रीम-जैसी पदार्थ सारे पेट पर अन्दर से 1 m.m. मोटा लेप-सा चढ़ा रहता है जो बनता रहता है, व साथ-साथ पचता रहता है।
पेट में इन्ट्रिनसिक फैक्टर (Intrinsic factor) नामक एक और चीज़ भी बनती है। इसका कार्य है कि साग-सब्जियों इत्यादि से प्राप्त Vitamin B12 को पेट और आंतड़ियों के पाचक स्रावों से बचाकर उसे छोटी आंत के ईलियम में ले जाने को मदद करना। वहाँ अन्य पोषण तत्वों के साथ विटामिन B12 ईलियम के विल्लाई (villi) द्वारा ऐजोर्ब (absorb) होकर रक्त में पहुँचेंगा और लिवर में स्टोर हो जायेगा।
पैलुरस (pylorus) यानि पाइलोरिक स्फीन्क्टर (pyloric sphincter) से जो खाना निकलता है वह सख्त नवाले से तरल पदार्थ में बदल चुका होता है। उसे काइम (chyme) कहते है। पेट में जो लहर चलती है उसके अनुसार पैलुरस से थोड़ा काइम बाहर निकलेगा और ड्युओडेनम में पहुँचेगा। उस काइम में एसिड कितनी सख्त मात्रा में है, उसी के मुताबिक ड्युओडेनम में सिक्रेटिन (secretin) नामक हार्मोन बनेगा। सिक्रेटिन तब ही बनेगा जब पेट के स्रावों का pH 4.5 से नीचे जाये। अगर पेट में एसिड ठीक से न बने या अगर उसमें पानी मिला दिया जाय तो पेट का pH 4.5 के नीचे नहीं जा सकता, और सिक्रेटिन नहीं बनेगा। सो खाना खाते साथ में पानी नहीं पीना चाहिये। जैसे-जैसे पेट का pH = 3 या उससे और नीचे जायेगा यानि जैसे-जैसे एसिड की मात्रा बढ़ेगी तो ज्यादा मात्रा में सिक्रेटिन निकलेगा।
सिक्रेटिन निम्न प्रकार से पांच जगह प्रभाव डालता है –
काइम की एसिड को शांत करने के लिये पैंक्रियास को उचित मात्रा में सोडियम बाइकार्बोनेट (NaHCO3) भेजने के लिये कहेगा जिससे काइम का pH = 3 या 1 से pH = 8 तक हो जाये। इसी pH में पैंक्रियास के एन्जाइम कार्य कर सकते है।
लिवर से कहेगा कि वह बाइल भेज दे। लिवर की बाइल पतली और ऐल्कली-युक्त होती है। वह भी काइम की एसिड को शांत करने में सोडियम बाइकार्बोनेट को मदद करेगी।
जेजुनम की मोटिलिटी को कम करे जब तक की फैट्स, प्रोटीन्स इत्यादि पच नहीं जाये।
पैलुरस (pylorus) से कहे कि वह तब तक बंद रहे और माल (काइम) तब तक नहीं भेजना जब तक कि जो माल ड्युओडेनम मे है – वह पचकर आगे न चला जाय।
गैस्ट्रीन को रोकेगा कि वह तब तक और एसिड बनाने का संदेश न दे जब तक पैलुरस नहीं खुलता।
सिक्रेटिन के अलावा ड्युओडेनम में कोलसिस्टोकाइनिन (cholecystokinin) नामक हार्मोन भी निकलता है जो दो जगह पर प्रभाव डालता है –
एक तो वह गौल ब्लैडर को संदेश देता है कि वह उचित मात्रा में बाइल (bile) भेज दे – जो फैट्स के कणों के बीच में फैल जाता है और उन्हें एक दूसरे से चिपकने नहीं देता।
दूसरा वह पैंक्रियास को संदेश देता है जो कि भोजन के सभी पदार्थ यानि फैट्स, कार्बोहाइड्रेट्स तथा प्रोटीन्स इन तीनों को पचाने के लिये जरूरत के अनुसार विभिन्न किस्म के पाचक एन्जाइम्स भेज दे।
गौल ब्लैडर का महत्व – लिवर 24 घंटों में करीब 1000 से 800 ml बाइल बनाता है। लेकिन यह पतली होती है। तो उसे गौल ब्लैडर में गाढ़ा करके रखा जाता है। या यूँ कह सकते है कि गौल ब्लैडर लिवर का गोदाम है जहाँ बाइल को स्टोर किया जाता है। लेकिन गौल ब्लैडर इतना छोटा है उसके अंदर सिर्फ 50-60 ml. माल ही रख सकते है। तो गौल ब्लैडर लिवर का भेजा हुआ करीब 450-500 c.c. बाइल से पानी को सोख लेगी और बाइल को गाढ़ा करके अपने अन्दर रख लेगी। मनुष्य हर दिन भोजन में कितनी मात्रा में फैट्स लेता है, उसके अनुसार गौल ब्लैडर को बाइल भेजने के लिये कहेगा जिसके बिना पैंक्रियास फैट्स को ठीक से पचा नहीं सकते।
अगर गॉल ब्लैडर ठीक से काम न करे तो बाइल के अभाव में फैट्स पचेंगे नहीं और उससे ड्यूओडेनम में माल आगे नहीं जायेगा।
आगे खाना जेजुनम में जाने के बाद वहां पर पैंक्रियास के भेजे हुये तीन किस्म के एन्जाइम्स उसे पचाते है। इनके मुख्य कार्य इस प्रकार है –
एक है पैंक्रियास का अमाईलेज (pancreatic amylase) – यह लाड द्वारा पचाये गये कार्बोहाइड्रेट्स के बड़े टुकड़ों को अत्यन्त छोटे-छोटे टुकड़ों में पचाकर उन्हें ग्लूकोज नामक रूप में बदल देगा। यानि अगर लार ठीक से न निकले तो कार्बोहाइड्रेट्स को पचाने का सारा बोझ पैंक्रियास के ऊपर आयेगा।
दूसरा है पैंक्रियास का लाईपेज (pancreatic lipase) – यह फैट्स के उन कणों को – जो कि बाइल ने चिपकने से रोक रखा है, उन्हें तोड़कर फैटी एसिड्स (fatty acids) और ग्लिजेरॉल (glycerol) नामक छोटे छोटे टुकड़ों में बदल देगा।
तीसरा है Trypsin तथा chymotrypsin – ये दोनो मिलकर पेप्सीन द्वारा पचाये गये प्रोटीन के बड़े टुकड़ों को और भी छोटे-छोटे टुकड़ों में पचाकर ऐमीनो एसिड्स (amino acids) नामक रूप में बदल देंगे। जैसे-जैसे खाना पचता जायेगा वैसे वह जेजुनम मे आगे बढ़ता जायेगा और फिर पािलोरस खोलेगा और नया काइम ड्यूओडेनम में आता जायेगा। पचा हुआ माल जब ईलियम में पहुँचेगा तो उन सभी चीजों को ईलियम के विल्लाई (villi) द्वारा सोख लिया जायेगा एवं पोर्टल वेइन (portal vein) द्वारा लिवर में भेज दिया जायेगा।
पचन क्रिया में लिवर का कार्य
लिवर पचाये गये माल में से विटामिन B₁₂, ग्लूकोज इत्यादि कई चीजो को स्टॉक (stock) कर अपने अन्दर रख लेता है। भविष्य में काम आने के लिये। वह फैट्स को कौलस्ट्रॉल में बदलता है। अगर भोजन में कोई बैक्टीरिया या कीटाणु हो जो पेट के ऐसिड से बच गया तो लिवर के कुफर सेल्स उन्हें खत्म कर देंगे। बाकी तत्व रक्त के अंदर भ्रमण करते हुये हर एक cell तक पहुँचते है और हर cell उनमें से अपने-अपने कार्यों के लिये जरूरत के अनुसार आवश्यक वस्तुओं को ले लेगी।
यानि इन सब से हमें यह समझना चाहिये कि शरीर का हर कार्य भोजन के पोषण तत्वों से ही होता है। और ये कार्य तभी हो सकते है जब भोजन का पचन और पचे हुये माल का अवशोषण ठीक प्रकार से हो।
खाने में जो फैट (fats) है वे पचने के बाद fatty acids इत्यादि के रूप में ब्लड में पहुँचते है। उन्हें लिवर बदलकर कौलस्ट्रॉल (cholesterol) बनाता है। शरीर में जितना कौलस्ट्रॉल है उसमें करीब 85% कौलस्ट्रॉल को लिवर वापस बाइल बनाने में खर्च कर लेता है जो दुबारा fats को पचाने में मदद करेगा। बाकी 15% कौलस्ट्रॉल को शरीर के निम्न ग्रंथी अपने स्टीरॉइड होर्मोन्स बनाने के लिये उपयोग करते है – ऐड्रिनल कॉरटेक्स – कोर्टोजोन, ऐल्डोस्टेरोन, ऐन्डोजेनस इत्यादि। मासिक धर्म में ओवरीज़ तथा गर्भदान के बाद प्लेसेन्टा (placenta) – एस्ट्रोजेन, प्रोजेस्टेरोन, टेस्टीस – टेस्टोस्टेरोन।
लेकिन बाइल से कौलस्ट्रॉल या कौलस्ट्रॉल के बाइल बनाने में 4-6% कौलस्ट्रॉल खर्च हो जाता है।
सो अगर मनुष्य फैट्स खाना बिल्कुल बन्द कर दे और उसके शरीर में ज्यादा कौलस्ट्रॉल न हो तो 16 दिन के बाद उसे कौलस्ट्रॉल की जरूरत पड़ेगी। Cholesterol के बिना adrenal cortex के होर्मोन नहीं बनेंगे और उन होर्मोन्स के बगैर मनुष्य जिन्दा ही नहीं रह सकता। सो हर 15 दिन बाद उसे थोड़ी फैट खानी शुरू कर देनी चाहिये ताकि कौलस्ट्रॉल बिल्कुल खत्म न हो जाये। हाँ, फैट्स में सबसे गुणकारी है असली घी, लेकिन घी खाने के बाद उसे पचाने के लिये वर्जिश करें या सीढ़ियाँ चढ़ें तो ज्यादा लाभदायक है। इतना ही नहीं, लिवर और पाचन संस्था का ठीक होना भी जरूरी है।
Anatomy physiology
Digestive System पाचन तंत्र या पचन संस्था के मुख्य कार्य