।LIVER
लिवर
लिवर हमारे शरीर की सब से बड़ी ग्रन्थि है। इस का वजन 1½ किलो है और यह पेट में या
एब्डोमेन में दाई तरफ स्थित है। ऊपर की तरफ यह दिल के पास न लगे। निचले भाग
में या इस के पीछे गॉल ब्लैडर (gall bladder) लगा है, जो लिवर के द्वारा बनाये गये पित्त
(बाइल) 24 घण्टे में लगभग 700 cc से या पीला पित्त निकलता है, वह इस में जमा रहता है।
खाने के बाद जब यह पित्त छोटी आंत में आता है, और उस पित्त वसा या तेल
का रंग बदल कर ग्रीन (green) बना देता है व उसे छोटे छोटे कणों में बदल
कर कोली सिस्टोकिनिन (chole cysto kinin) नामक हार्मोन बनाता है और उस आवश्यक
अनुसार गॉल ब्लैडर के रास्ते नाल यानी बाइल डक्ट के द्वारा ऑफ वेटर (ampulla of
Vater) द्वारा ड्यूडेनम में छोड़ देता है, तब वह भोजन के साथ में आ जाता है, तेल घुलने के बाद छोटे छोटे
अंशों में बदल कर या पचा कर रख देता है, जिसे पैंक्रियाज के लाइपेज द्वारा छोटे छोटे कणों में या फैटी
एसिड में बदल दिया जाता है। जिसे छोटी आंत के इलियम में अवशोषित किया जाता है या ग्लूकोज
(absorb) कर फिर लिवर में भेज दिया जाता है। और फिर इस कोलेस्ट्रॉल (cholesterol) में बदल दिया
जाता है, और फिर इस कोलेस्ट्रॉल से लिवर द्वारा बाइल बनाता है, जिस क्रिया में 94 प्रतिशत कोलेस्ट्रॉल
का उपयोग हो जाता है, और बाकी 6 प्रतिशत वेस्ट (waste) हो जाता है। लिवर आप ही कोलेस्ट्रॉल बनाता है
या शरीर में जितना कोलेस्ट्रॉल बनता है – जिसे स्टेरॉयड (steroid) कहते हैं – उस का 85 प्रतिशत भाग
बाइल बनाने में खर्च कर देता है। बाकी के 15 प्रतिशत स्टेरॉयड या कोलेस्ट्रॉल से एस्ट्रोजन,
प्रोजेस्टेरोन या टेस्टोस्टेरोन हार्मोन बनाये जाते हैं एवं एड्रिनल ग्रन्थि से कोर्टिसोल बनता है।
लिवर हमारे शरीर की एक बहुत ही बड़ी लेबोरेट्री (laboratory) है जो बहुत कठिन कार्य भी
एक सेकण्ड के सौवें हिस्से में कर देता है, जिसे हम सोच भी नहीं सकते। इस के पाँच सौ से अधिक
फंक्शन्स (functions) या कार्य हैं, जिस में हजारों से भी अधिक एन्जाइम्स (enzymes) बनते हैं।
लिवर हमारे शरीर का एक बहुत ही बड़ा गोदाम या गोडाउन है, जिस में हमारी जरूरत की वस्तुएं पड़ी रहती
हैं, जिसे शरीर को आवश्यकता होने पर वह बना देता है या दे देता है। जैसे कि इस में VIT B12
(stock) एक बार से छः साल तक रहता है, और जिस तरह की आवश्यकता हो उसे यूरिया बनाकर
पेशाब के रास्ते से शरीर के बाहर फेंक देता है। इस में इतना ग्लाइकोजन (glycogen) रहता है कि
आवश्यकता होने पर यह उस ग्लाइकोजन से दो सौ पचास ग्राम तक ग्लूकोज को बना सकता है। यह
आवश्यकता होने पर पानी से ग्लूकोज और ग्लूकोज से प्रोटीन बना देता है। और इसी प्रकार प्रोटीन से
ग्लूकोज और ग्लूकोज से पानी एक सेकण्ड के सौवें हिस्से या भाग में बना देता है।
मनुष्य के जन्म होने पर यह विटामिन K (VIT K) द्वारा – उसका अन्दर स्टोर रहता है। –
उससे घाव भरता है या खून का क्लोट बना कर बहते रक्त को रोकता है। रक्त को दिखाने के लिये यह
विटामिन A बनाता है जो इस में पड़े रहते यानी स्टोर रहते हैं।
किडनी एरिथ्रोपोइटिन (erythropoietin) बनाती है – जिस के मिलने पर ही बोन मेरो (bone
marrow) एक बनाती है। बोन मेरो पचास प्रतिशत से अधिक शरीर की रक्त की आवश्यकता को पूरा करता
है। लेकिन किडनी के फेल होने पर एरिथ्रोपोइटिन नहीं बनेगा – उस समय लिवर ही एरिथ्रोपोइटिन बनाता
है। चाहे कम मात्रा में बनाता है परन्तु मनुष्य की मृत्यु को बचाता है।
पिट्यूटरी ग्लैण्ड जब हार्मोन बनाता है, तो जरूरत से अधिक ही बनाता है और जितने जिस ग्रन्थि को
चाहिये उतने उस के उपयोग करने के बाद बाकी जो अधिक हार्मोन रक्त द्वारा लिवर में जाते हैं, लिवर उन्हें
समाप्त कर देता है। इसी प्रकार कोई भी वस्तु जो अधिक हो लिवर संभालता है। हाँ, लिवर का ठीक होना
आवश्यक है – जिसे हम शराब पी कर खराब कर देते हैं। बीमारी के आने पर यह एण्टीबॉडी बनाकर
शरीर को बीमारी से बचाता है। माँ के पेट में जब बच्चा बनता है तो छठे सप्ताह से तीन महीने तक
यह बच्चा भी रक्त बनाता है, पीछे स्प्लीन भी रक्त बनाती है और फिर बोनमैरो के रक्त बनाने पर यह दोनों
रक्त बनाना बन्द कर देते हैं। यह आवश्यकता आने पर प्रोटीन से अमीनो एसिड और अमीनो एसिड को
प्रोटीन में बदल देता है।
लिवर की अन्दर की झिल्ली या म्यूकोसा हेपरिन (heparin) को बनाती है, जिस से रक्त में थक्का
या क्लॉट न बने। लिवर एवं लंग्स दोनों मिलकर शरीर में 85% हेपरिन बनाते हैं, बाकी 15% शरीर के
हर टिश्यू में बनता है। लिवर विषैले या जहर को एड्रिनल ग्लैण्ड की सहायता से समाप्त कर सकता है। बहुत
सख्त व्यायाम करने पर शरीर के मसल्स जो लैक्टिक एसिड को बनाते हैं – जो अधिक होने पर कुछ
नुकसान शरीर को पहुंचा सकता है – उसे लिवर ग्लाइकोजन (glycogen) में बदल देता है और अपने अन्दर
रख लेता है। स्प्लीन से निकले हुए रक्त में जो रेड सेल्स (RBC’s) उसने मारे होते हैं, उनमें से
उपयोगी वस्तुएं – जैसा कि हीमोग्लोबिन इत्यादि – को लिवर रख लेता है, बाकी कचड़ा सांस या टट्टी
द्वारा बाहर फेंक जाता है। लिवर हमारे शरीर की एक ऐसी ग्रन्थि है जो 80% खराब होने पर भी या 80%
अगर काट दिया जाये और बाकी जो 20% रह गया है वह इस शरीर के लिये काफी है। और शरीर के सबकार्य यह सुचारु रूप से कर सकता है। और अगर मनुष्य खाने पीने का ठीक तरह से ध्यान रखें या शुद्ध प्राकृतिक का उपयोग में करें, तो चार-छः महीने में वह बिगड़ा हुआ लिवर भी शुद्ध कर सकता है। यह ठीक हो जाने के बाद तो विचार ही करना चाहिए कि हमारे शरीर के ऐसे ऐसे रोग होते हैं, कि 80% भाग काट दिया जाए तो वह अपने आप भी फिर उसी तरह की कुछ महीनों में दुबारा बन जाता है। जिस तरह से समुद्र की मछली (star fish) कटने के बाद अपने आप नई उग जाती है।
लिवर का उपयोग या साइड इफेक्ट समाप्त कर देता है, पर पाचन ठीक होना आवश्यक है, नहीं तो दवाइयों के साइड इफेक्ट्स शरीर पर अवश्य प्रभाव डालेंगे।
लिवर में कॉपर (copper) का स्टोर रहता है या स्टोर करता है, और आयरन लिवर में फेरिटिन (ferritin) के रूप में रहता है, जो आवश्यकता पड़ने पर वापस निकलता है।
लिवर ठीक काम करने से ही किडनी द्वारा 1.25 DCC (डाय हाइड्रॉक्सी कोले कैल्सीफेरोल) हार्मोन जो आंतों को कैल्शियम सोखने (absorb) करने को उत्तेजित करता है, जिससे वह कैल्शियम बनता है जो शरीर की हड्डियों में पहुंचाया जाता है, या शरीर में आवश्यकता पड़ने पर हड्डियों से निकाल कर ब्लड को कैल्शियम दिया जाता है। मतलब लिवर के सहयोग से 1.25 DCC बनता है, जो कि कैल्शियम के पाचन तथा उपयोग में सहायता करता है।
लिवर किसी भी एक अमीनो एसिड को दूसरे अमीनो एसिड में बदलता है या इससे ATP बनाता है या अमीनो एसिड से फैट्स या कार्बोहाइड्रेट्स को बनाता है। यह रक्त के कई प्लाज्मा प्रोटीन भी बनाता है।
हार्ट में रक्त जाने से पहले लिवर से ही जाता है – यह उस रक्त को जो शरीर की कोशिकाओं से वहां आता है, लिवर के कुप्फर सेल्स (Kupffer Cells) 99% तक साफ कर देते हैं। बाकी का रक्त लंग्स में साफ कर दिया जाता है। लिवर के द्वारा भोजन के पोषक तत्त्वों का निर्माण कर हार्ट तक पहुंचाया जाता है, ताकि हार्ट को काम करने के लिए आवश्यक तत्व प्राप्त हो सकें।
लिवर के कुप्फर सेल्स 35 पुराने लाल रक्त कणिकाओं (RBC’s) को भी साफ कर समाप्त कर देते हैं जिनकी 120 दिन की उम्र होती है, और रक्त में नया निर्माण करते हैं। रक्त में जब इन्फेक्शन होता है तब शरीर के कुप्फर सेल्स उसे समाप्त करते हैं या वह बैक्टीरिया जो इन्फेक्शन का कारण होता है उसे समाप्त कर देता है। वहां पर नया निर्माण भी करता रहता है।
लिवर एक इंसुलिन जैसा मादक बनाता है जिसे सोमैटोमेडिन C (somatomedin C) कहते हैं, जो ग्रोथ हार्मोन को उत्तेजित करता है। लिवर थायरॉइड ग्रंथि से T4 के हार्मोन से T3 बनाता है।
लिवर एंजियोटेंसिनोजन (Angiotensinogen) बनाता है जिसमें रेनिन के साथ मिलकर एंजियोटेंसिन I बनता है, और एंजियोटेंसिन II बनता है जो रक्तचाप को नियंत्रित करता है।
लिवर में रक्त के जमने का मादा प्रोथ्रोम्बिन (prothrombin) और फाइब्रिनोजन (fibrinogen) बनता है जिससे रक्त के थक्के बनते हैं या रक्तस्राव रुकता है।
लिवर में बना बाइल या बाइकार्बोनेट काफी अधिक होता है जो पित्ताशय से सोडियम बाइकार्बोनेट के साथ मिलकर डुओडेनम में आए हुए अम्ल को शांत करने में मदद करता है।
लिवर ही हीम (heme) से बाइल पिगमेंट्स (bile pigments) को बनाता है।
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(1) point liver × 6 treatments के उपयोग –
एक-एक घंटे या दो-दो घंटे के अंतर से सारा दिन देना निम्न बीमारियों में लाभप्रद है –
लिवर की बीमारियों में जैसे –
हेपेटाइटिस (hepatitis), पीलिया (jaundice), सिरोसिस (cirrhosis),
fatty infiltration of liver यानी लिवर के अंदर के हिस्सों में फैट का जमाव होना, जिससे उसके कार्य में विघ्न हो।
सभी serious या जटिल बीमारियों के लिए – जैसे किडनी की बीमारियां, स्तन या टेस्टिकुलर में हो,
एपिलेप्सी, HIV, AIDS, cancer; रक्त में ब्लड इन्फेक्शन हो; रक्त संचार के प्रोब्लम इत्यादि के लिए;
लंग्स का बढ़ना, पाचन, वजन या कमजोरी,
एरिथ्रोपोइटिन के लिए, B12 की कमी, RBC का हीमोग्लोबिन बनना – खास कर प्रेगनेंट यानी गर्भवती औरतों में,
WBC बढ़े हो, या प्लेटलेट्स बढ़े या घटे हो, प्रोटीन कम या ज्यादा हो, एल्ब्यूमिन प्रोटीन को कम करने इत्यादि